वट सावित्री व्रत हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए रखा जाने वाला अत्यंत पवित्र व्रत है। यह व्रत ज्येष्ठ अमावस्या या पूर्णिमा को रखा जाता है और विशेष रूप से उत्तर भारत, महाराष्ट्र, गुजरात, बिहार और मध्य प्रदेश में प्रचलित है।
वट सावित्री व्रत का महत्व
वट सावित्री व्रत का संबंध देवी सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा से जुड़ा है। सावित्री ने अपने तप, बुद्धि और दृढ़ संकल्प से यमराज से अपने मृत पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे

वट (बरगद) का पेड़:
- दीर्घायु का प्रतीक है
- स्थिरता और शक्ति दर्शाता है
- त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का वास माना जाता है
इसी कारण महिलाएं वट वृक्ष की पूजा करती हैं।
📅 वट सावित्री व्रत कब मनाया जाता है?
यह व्रत तीन प्रकार से मनाया जाता है:
- ज्येष्ठ अमावस्या – उत्तर भारत
- ज्येष्ठ पूर्णिमा – बिहार, झारखंड
- ज्येष्ठ त्रयोदशी – महाराष्ट्र
पूजा सामग्री सूची
- बांस का पंखा
- पानी से भरा कलश
- रोली, चावल, फूल
- कच्चा सूत / धागा
- फल, मिठाई
- दीपक, अगरबत्ती
- सावित्री-सत्यवान की कथा पुस्तक

वट सावित्री व्रत पूजा विधि (Step by Step)
1.सुबह जल्दी उठकर स्नान करें
2.लाल या पीले वस्त्र पहनें
3.वट वृक्ष के नीचे पूजा स्थान साफ करें
4.कलश स्थापित करें
5.वट वृक्ष पर धागा 7 या 108 बार लपेटें
6.रोली-चावल-फूल अर्पित करें
7.सावित्री-सत्यवान की कथा सुनें/पढ़ें
8.पति की लंबी उम्र की कामना करें
9.शाम को व्रत खोलें
वट सावित्री व्रत कथा
प्राचीन समय में मद्र देश के राजा अश्वपति थे। उनके कोई संतान नहीं थी। उन्होंने कई वर्षों तक तपस्या कर देवी सावित्री की आराधना की। देवी की कृपा से उन्हें एक सुंदर, तेजस्वी कन्या प्राप्त हुई, जिसका नाम उन्होंने सावित्री रखा।
सावित्री बड़ी होकर अत्यंत बुद्धिमान, धर्मपरायण और पतिव्रता बनी। विवाह योग्य होने पर राजा ने उसे स्वयं वर चुनने भेजा। सावित्री ने वनवासी राजकुमार सत्यवान को अपना पति चुना।
लेकिन नारद मुनि ने राजा को बताया कि सत्यवान अल्पायु है और विवाह के एक वर्ष बाद उसकी मृत्यु निश्चित है। राजा ने सावित्री को समझाया, परंतु सावित्री अपने निर्णय पर अटल रही।
विवाह के एक वर्ष बाद, जिस दिन सत्यवान की मृत्यु निश्चित थी, सावित्री ने व्रत रखा और अपने पति के साथ वन गई। वहाँ सत्यवान को अचानक चक्कर आया और वह सावित्री की गोद में गिरकर प्राण त्याग बैठा।
उसी समय यमराज सत्यवान का प्राण लेने आए। सावित्री भी उनके पीछे चल पड़ी। यमराज ने उसे लौटने को कहा, लेकिन सावित्री ने अपने पतिव्रत धर्म, बुद्धिमत्ता और विनम्रता से यमराज को प्रसन्न कर लिया।
यमराज ने उसे वरदान मांगने को कहा।
सावित्री ने चतुराई से पहले अपने ससुर की आंखों की रोशनी और राज्य मांगा, फिर अपने माता-पिता को संतान का सुख मांगा और अंत में कहा –“मुझे सौ पुत्रों की माता बनने का वरदान दीजिए।”
यमराज ने वरदान दे दिया। तभी सावित्री ने कहा –“बिना पति के संतान कैसे संभव है?”
सत्यवान जीवित हो उठा और दोनों सुखी जीवन बिताने लगे।
📖 वट सावित्री व्रत कथा (संक्षेप)
राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री ने सत्यवान से विवाह किया, जिसे अल्पायु का वरदान मिला था। एक दिन सत्यवान की मृत्यु हो गई। सावित्री यमराज के पीछे चली गई और अपने पतिव्रत धर्म, बुद्धिमत्ता और तप से यमराज को प्रसन्न कर सत्यवान के प्राण वापस ले आई। तभी से यह व्रत सुहागिन महिलाओं द्वारा किया जाता है।

⚠️ व्रत के नियम
- व्रत में फलाहार या निर्जला व्रत
- झूठ न बोलें
- क्रोध से बचें
- पति का सम्मान करें
- सात्विक भोजन करें
🌺 वट सावित्री व्रत का लाभ
- पति की आयु लंबी होती है
- वैवाहिक जीवन सुखी रहता है
- परिवार में समृद्धि आती है
- मानसिक शांति मिलती है
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q. क्या कुंवारी लड़कियाँ वट सावित्री व्रत कर सकती हैं?
हाँ, अच्छे वर की कामना हेतु कर सकती हैं।
Q. वट वृक्ष न हो तो क्या करें?
घर में बरगद की टहनी या चित्र से पूजा कर सकते हैं।